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कालिका पुराण भाग - 2 Pdf बिल्कुल फ्री

नमस्कार मित्रों 
 
कालिका पुराण भाग - 2



इस पोस्ट में आप सभी को कालिका पुराण नामक पुस्तक का भाग - २ उपलब्ध करवा रहा हूं। यह एक बहुत ही अच्छी पुस्तकें इसमें आपको माता काली से संबंधित सारी जानकारी देखने को मिलेगी। इस पुस्तक का जो निर्माण है लेखक ने सभी वेद पुराणों को देखकर उनका अध्ययन करके उन सभी की जानकारी को लेकर एक बहुत ही अच्छे पुस्तक उन्होंने बनाई है। यह पुस्तक एक बहुत ही अच्छी पुस्तकें हैं।
 

कालिका पुराण,(संस्कृत: कालिकापुराणम्:) जिसे काली पुराण, सती पुराण या कालिका तंत्र भी कहा जाता है, अठारह नाबालिगों में से एक है पुराण (उपपुराण) शक्तिवाद हिंदू धर्म की परंपरा में यह पाठ संभवतः भारत के असम क्षेत्र में रचा गया था और इसका श्रेय ऋषि मार्कंडेय को दिया जाता है। यह कई संस्करणों में मौजूद है, विभिन्न रूप से 90 से 93 अध्यायों में व्यवस्थित है। पाठ के बचे हुए संस्करण इस मायने में असामान्य हैं कि वे अचानक शुरू होते हैं और एक प्रारूप का पालन करते हैं जो न तो प्रमुख या लघु पुराण - हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में पाया जाता है।
 
देखिए पुराण भारत तथा भारतीय संस्कृति की सर्वोत्तम निधि हैं। ये अनन्त ज्ञान राशि के भण्डार हैं। इनमें इहलौकिक सुख शान्ति से युक्त सफल जीवन के साथ-साथ मानवमात्र के वास्तविक लक्ष्य-परमात्मतस्थ की प्राप्ति तथा जन्म-मरण से मुक्त होने का उपाय और विविध साधन बड़े ही रोचक, सत्य और शिक्षाप्रद कथाओं के रूप में उपलब्ध हैं। इसी कारण पुराणों को अत्यधिक महत्त्व और लोकप्रियता प्राप्त है, परंतु आज ये अनेक कारणों से दुर्लभ होते जा रहे हैं। 
 
जो एक बार भी इस कालिका पुराण का पाठ करता है वह सभी कामनाओं को प्राप्त करके अमृतत्व अर्थात् देवत्य को प्राप्त किया करता है। जिससे मन्दिर में यह लिखा हुआ उत्तम पुराण सदा स्थित रहता है, हे द्विजो! उसको कभी विघ्न नहीं होता जो पुराण सदा स्थित रहता है, हे द्विजो! उसको कभी विघ्न नहीं होता। जो प्रतिदिन इसका गोपनीय अध्ययन करता है जे कि यह परम तन्त्र है। हे द्विज श्रेष्ठों! उसने यहाँ पर ही सम्पूर्ण वेदों क अध्ययन कर लिया है। इस कारण से इससे अधिक अन्य कुछ भी नहीं है। विलक्षण पुरुष इसके अध्ययन से कृतकृत्य हो जाता है।
 
इसके अध्ययन तथा श्रवण करने वाला पुरुष परम सुखी तथा लोक में बलवान् और दीर्घ आयु वाली भी हो जाता है। जो निरन्तर लोक का पालन करता है और अन्त में विनाश करने वाला है। यह सम्पूर्ण भ्रम या अभ्रम से युक्त है मेरा ही स्वरूप है, अतएव उसके लिए नमस्कार है। योगियों के हृदय में जिसका प्रपञ्च प्रधान पुरुष है, जो पुराणों के अधिपति भगवान् विष्णु और वह भगवान् शिव आप सबके ऊपर प्रसन्न हों। जो उग्र हेतु है, पुराण पुरुष है, जो शाश्वत तथा सनातन रूप ईश्वर है, जो पुराणों का करने वाला और वेदों तथा पुराणों के द्वारा जानने के योग्य है उस पुराण शेष के लिए मैं स्तवन करता हूँ और अभिवादन करता हूँ। जो इस प्रकार से समस्त जगत् का विशेष रूप से स्मरण किया करती है, जो मधुरिपु को भी मोह कर देने वाली हैं, जिसका स्वरूप रमा है और शिवा के स्वरूप से जो भगवान् शंकर का रमण कराया करती है माया आपके विभव को और शुभों को वितरित करे।

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