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गौरी काञ्चलिकातन्त्र पुस्तक || Gaurikanchalika Tantra pdf


नमस्कार मित्रो
आपका हमारे ब्लॉग श्री राम परिवार में हार्दिक स्वागत है। मित्रों तन्त्र शब्द अनेक अर्थ हैं जो शास्त्र पुराण इतिहास आदि में स्पष्ट विदित होते हैं परन्तु ' तन्त्र' शब्द सुनते ही बुद्धि में श्रीशिवशिवासंवादरूप तन्त्र शास्त्र का बोध होने लगता है । यह ' गौरीकाञ्चलिकातन्त्र 'शिवशिवासंवाद होने पर भी उससे कुछ विलक्षण है । इसमें श्री भवानी जी ने भगवान शंकर से लोकोपकार की बुद्धि से मनुष्यों को रोग, शोक और मृत्युके भयसे बचाने के लिये प्रश्न किया है, उसके उत्तर में श्रीशंकर जी ने भी ज्वरादि रोगों पर नाना प्रकार के कल्प कहे हैं, यद्यपि कन्द, मूल, वनस्पति आदियों में नाना प्रकारकी शक्ति स्वतः सिद्ध है और उनके प्रयोग से लाभ भी होता है, परन्तु तिथि, नक्षत्र, बार, ऋतु इत्यादि के नियम से उनका खनना उखाडना, इत्यादि क्रिया से उनमें विशेष बल आ जाता है और वो बहुत ज्यादा प्रभावी और शक्तिशाली हो जाती है। जैसा शरद और हेमन्त में वृक्षोंकी छाल और जड को लेना, · शिशिर में फल बसन्त में फूल और पत्ती इत्यादि यह शरीर रक्षणका अच्छा उपाय है। इन सब बातोंको कहकर महादेव ने न जाने कितने ही उपाय इसमें ऐसे बताए हैं। जिनसे मनुष्यको अपने आयुष्य का ज्ञान हो जाता है । जिससे वह नाना प्रकारके उपाय कर सकता है, और कई कल्प इसमें ऐसे बनाये गये हैं कि जिनके विधि पूर्वक सिद्ध करनेसे मनुष्य वृद्धावस्था तथा मृत्यु के भयको भी जीत सकता है। इस प्रकार बडे बडे कल्प कह कर युवाए युवतियों के देहराग के लिये उबटन, शरीर को सुडौल तथा रमणीय बनाने के उपाय, वशीकरण प्रयोग, स्मृतिशक्ति बढाने तथा उत्तम स्वर होने के उपाय नाना प्रकार के अञ्जन लक्ष्मी वृद्धि के उपाय इत्यादि अनेक उपयोगी विषय कहे हैं।

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